शीतकालीन शाकों के राजा :बैंगन (Brinjal)

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भारत में प्राचीन काल से बैंगन सर्वत्र होते हैं। इसकी लोकप्रियता, स्वाद और गुण शीतकाल तक ही सीमित है, अतः बैंगन को सभी शीतकालीन शाकों के राजा के रूप में जानते हैं। ग्रीष्मकाल के आगमन के साथ इसका स्वाद बदल जाता है और यह गर्म महसूस होने लगता है।

बैगन की किस्में

बैंगनों में मुख्यतः काली और सफेद-इस प्रकार दो किस्में होती हैं। काले बैंगन अधिक गुणकारी माने जाते हैं। आकार-भेद से लंबे बैंगन और गोल बैंगन-इस प्रकार दो अन्य किस्में भी होती हैं। बेल-बैंगन की एक अन्य किस्म भी है, परंतु गुण की दृष्टि से वह निम्न-कक्षा की है।

अत्यधिक बीजवाले बैंगन और नर्म कुम्हड़ा विषरूप हैं – ‘वृन्ताकं बहु 821 बीजानां कुष्माण्डं च कोमलं विषम्।’ बैंगन जितने अधिक कोमल होते हैं उतने ही अधिक गुणवाले और बलवर्धक माने जाते हैं। ग्रीष्मकाल के आगमन पर होनेवाले या ज्यादा बीजवाले बैंगन वर्ज्य हैं।

आरोग्य की दृष्टि से हितकारी बैगन

आरोग्य की दृष्टि से हितकारी है। शरद ऋतु में पित्त का प्रकोप होता है। अतः इस ऋतु में पित्तकर बैंगन खाने से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। वसंत ऋतु के आरंभ में बैंगन का सेवन लाभकारी है, क्योंकि यह कफनाशक है। बैंगन को ‘शाक-नायक’ कहनेवाले ‘क्षेम-कुतूहल’ ग्रंथ के रचयिता एक वैद्य-कवि ने बैंगन के साग के विषय में इस प्रकार कहा है- “बिना बैंगन का भोजन धिक् है। बैंगन हो, पर बिना टैंप का हो तो धिक् है। ढेप हो, पर साग यदि तेल से भरपूर न हो तो धिक् है और टेंपवाला तथा भरपूर तेलवाला बैंगन का साग हो, परंतु यदि उसमें हींग न हो तो वह धिक् है।” तेल और हींग में बनाया हुआ बैंगन का साग वायु-प्रकृतिवालों के लिए बहुत लाभकारक है। कफ प्रकृतिवालों व सम-प्रकृतिवालों के लिए भी ठंडी ऋतु में बैंगन का सेवन गुणकारी है। बैंगन मूत्र-वर्धक हैं।

बैंगन मधुर, तीक्ष्ण, गर्म, पाक में तिक्त परंतु पित्त न करनेवाले; ज्वर, वायु तथा कफ को मिटानेवाले, अग्नि को प्रदीप्त करनेवाले, वीर्यवर्द्धक एवं हल्के हैं। छोटे, सुकोमल बैंगन कफ तथा पित्त को दूर करते हैं। बढ़कर बड़े होने पर जो बैंगन जरठ हो गये हों वे पित्त करनेवाले तथा हल्के होते हैं। सुकोमल बैंगन निर्दोष होते हैं और सभी दोषों को दूर करते हैं। अंगारों पर पकाया हुआ, भुर्ता-बैंगन कुछ-कुछ पित्त करनेवाला, अत्यंत हल्का तथा अग्नि को प्रदीप्त करनेवाला है। यह कफ, मेद, वायु और आम को मिटाता है। बैंगन में तेल और नमक डालने पर वह भारी और स्निग्ध हो जाता है। सफेद, मुर्गी के अंडे जैसा बैंगन अर्श पर हितकारी है एवं काले बैंगन की अपेक्षा कम गुणवाला है। बैंगन और टमाटर का सूप बनाकर पीने से मंदाग्नि मिटती है और आम का पाचन होता है।

कोमल बैंगन को अंगारों पर सेंककर रोज सुबह खाली पेट गुड़ के साथ खाने से, मलेरिया बुखार से तिल्ली (प्लीहा) बढ़ गई हो और इसके कारण शरीर पीला पड़ गया हो तो, लाभ होता है।

कोमल बैंगनों को अंगारों पर सेंककर, शहद में मिलाकर, शाम को चाटने से नींद अच्छी आती है। यह प्रयोग कुछ दिनों तक जारी रखने से अनिद्रा की शिकायत दूर होती है।

बैंगन का साग, भुर्ता या सूप बनाकर, हींग और लहसुन के साथ सेवन करने से, पेट के भीतर के वायु का जोर कम होता है और गुल्म मिटता है।

स्त्रियों का ऋतुस्राव बंद हो गया हो, क्षीण हो गया हो या साफ न आता हो तो सर्दियों में बैंगन का साग, बाजरे की रोटी और गुड़ का नियमित सेवन करना चाहिए। इससे लाभ होता है। (गर्म प्रकृतिवाली स्त्रियाँ यह प्रयोग न करें।)

बैंगन का साग खाने से पेशाब की छूट होकर प्रारंभिक अवस्था की छोटी पथरी पिघल जाती है।

बैंगन को अंगारों पर सेंककर, उसमें सज्जीखार मिलाकर पेट पर बाँधने से, पेट में भार हो गया हो तो वह दूर होता है।

बैंगन की पुल्टीस फोड़े-फुन्सियों पर बाँधने से फोड़े जल्दी पक जाते हैं। बैंगन को सेंककर, उसमें दही मिलाकर, नारू पर भी बाँधा जाता है।

बैंगन का चार तोला भर रस पीने से धतूरे का विष उतरता है।

शीतकाल में बैंगन पथ्य होने पर भी पित्त प्रकृतिवालों, गर्म प्रकृतिवालों, अर्श तथा अम्लपित्तवालों को यह अनुकूल नहीं होते। अतः पित्त प्रकृतिवालों, सगर्भा स्त्रियों तथा अम्लपित्तवालों को बैंगन नहीं खाने चाहिए। बैंगन गर्म हैं, अतः ग्रीष्म काल में त्याज्य हैं। बैंगन के अत्यधिक सेवन से वीर्य पतला हो जाता है और अत्यधिक मात्रा में मसालों के उपयोग से आँखों तथा दस्त में दाह होता है।

वैज्ञानिक मत के अनुसार बैंगन में कार्बोहाइड्रेट, चरबी, प्रोटीन और अन्य क्षार कम-अधिक मात्रा में हैं। इसमें विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘बी’ विटामिन ‘सी’ और लोह भी हैं। बैंगन के ढेप में खाद्य तत्त्वों और विटामिनों की मात्रा अधिक होने के कारण, शाक में ढेप का उपयोग करना आवश्यक है।